जिन्हें हम भूल गए : विदेशी क्लब के लिए खेलने वाले पहले प्रोफेशनल भारतीय वॉलीबॉल स्टार जिमी जॉर्ज

इटली के ब्रेस्किया प्रॉविन्स में स्थित मुंतिसियर कस्बे में घूमते हुए अगर आपको कहीं पालाज़ेट्टो जिमी जॉर्ज अरेना दिखे तो वहां जरूर रुकें। रुककर देखें और सोचें कि आखिर क्यों हमारे इतिहास के महानतम स्पोर्ट्स हीरोज में से एक की परवाह की बात होने पर हमारे महान देश को इस यूरोपियन देश के इस छोटे से इलाके के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है।

अगर आपको अभी तक नहीं पता तो जान लें कि जिमी जॉर्ज एक इंडियन वॉलीबॉल प्लेयर थे। केरल में पैदा हुए जिमी की बेहद कम उम्र में इटली में मौत हो गई थी। वॉलीबॉल के इतिहास के बेस्ट प्लेयर्स में से एक जिमी आज भारत में बस केरला और काफी हद तक कन्नूर रीजन में ही सीमित होकर रह गए हैं।

पहले ‘इंडियन’ जॉर्ज

मुंतिसियर में एक वॉलीबॉल क्लब है जिसे पहले एक्वा पैराडिसो गबेका मुंतिसियर और अब गबेका पल्लावोलो के नाम से जाना जाता है। साल 1955 की आठ मार्च को केरल में पैदा हुए जिमी जब इस क्लब के लिए खेल रहे थे उसी वक्त 30 नवंबर 1987 को इटली के मोडेना प्रॉविन्स में हुए एक कार एक्सिडेंट में उनकी मौत हो गई थी।

महज 32 साल की उम्र में अपनी मौत के वक्त तक जिमी वॉलीबॉल की दुनिया पर राज करने वाले चंद प्लेयर्स में शामिल रहे थे। जिमी प्रोफेशनल बनने और किसी फॉरेन क्लब के लिए खेलने वाले पहले इंडियन वॉलीबॉल स्टार थे।

अंजू बॉबी जॉर्ज के शब्दों में जिमी

जिमी के सबसे छोटे भाई रॉबर्ट बॉबी जॉर्ज की पत्नी और हाई जंप में भारत के लिए कई मेडल्स जीत चुकीं अंजू बॉबी जॉर्ज ने जिमी को याद करते हुए पिछले साल मलयालम मनोरमा में लिखा था, ‘साल 1987 में जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तब मैंने पहली बार रॉबर्ट के बारे में सुना। एक शाम जब मैं स्कूल से वापस आ रही थी तब मैंने आने-जाने वालों को कहते हुए सुना, ‘कितना दुखद है कि जिमी जॉर्ज की मौत हो गई। अगर शरीर को अलपुझा की जगह कोट्टायम के रास्ते ले जाया जाता तो हमें भी उनके पार्थिव शरीर के दर्शन हो जाते।

उनकी बातों से मुझे बस इतना लगा कि जिमी जॉर्ज कोई महत्वपूर्ण शख्सियत थे और फिर घर पहुंचकर मैंने अपनी मां से उनके बारे में पूछा। मां ने बताया कि वह एक मशहूर वॉलीबॉल प्लेयर थे जिनकी इटली में हुई एक कार दुर्घटना में मौत हो गई। जाने क्यों यह घटना मेरे साथ आजीवन बनी रही और मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं एकदिन उसी परिवार में बहू बनकर जाऊंगी।’

इटैलियन टीम के साथ जिमी

जब जॉर्ज के घर की बहू बनीं अंजू

अंजू ने आगे लिखा, ‘मैं सबसे पहले बॉबी से SAI के बेंगलुरु सेंटर में एक ट्रेनिंग के दौरान मिली थी। वहां मौजूद बाकी केरला के एथलीट्स ने बॉबी का परिचय यही कहकर दिया कि यह जिमी जॉर्ज के सबसे छोटे भाई हैं। उस वक्त मेरे दिमाग में सबसे पहली चीज वही आई जब मैंने जिमी की मौत के बारे में सुना था।’

केरला के लोगों पर जिमी के प्रभाव की चर्चा करते हुए अंजू लिखती हैं, ‘शादी के बाद लोकल लोगों से बात करते हुए मैंने जाना कि जिमी भैया कितने खास इंसान थे। शादी के बाद से एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब किसी ने उनका जिक्र ना किया हो।’

लंबी है जिमी के अवॉर्ड्स की लिस्ट

हवा में काफी ऊंची जंप मारकर लगाए गए अपने पॉवरफुल स्मैश के लिए मशहूर जिमी ने महज 19 साल की उम्र में नेशनल टीम के लिए डेब्यू कर लिया था। महज 21 साल की उम्र में अर्जुन अवॉर्ड जीतने वाले जिमी यह उपलब्धि हासिल करने वाले सबसे युवा वॉलीबॉल प्लेयर थे।

साल 1979 से 82 तक अबू धाबी स्पोर्ट्स क्लब के लिए खेलने वाले जिमी को इस दौरान गल्फ रीजन का बेस्ट वॉलीबॉल प्लेयर चुना गया था। साल 1982 से 84 और फिर 85 से 87 तक इटली में खेलने वाले जिमी अपने प्राइम पर दुनिया के बेस्ट अटैकर्स में से एक माने जाते थे।

बेहद टैलेंटेड और जमीनी व्यक्ति थे जिमी

बकौल अंजू, जिमी इतने बड़े स्टार होने के बावजूद जमीन से जुड़े थे और जब भी वह अपनी किसी फॉरेन ट्रिप से लौटते थे तब उनका बैग घरवालों की जगह आसपास के लोग खोलते थे। अंजू लिखती हैं, ‘लोग उस महान प्लेयर और उससे भी ज्यादा महान इंसान से काफी प्यार करते थे।’

वॉलीबॉल में इतना नाम कमाने वाले जिमी वह काफी बुद्धिमान भी थे। MBBS में एडमिशन हासिल कर चुके जिमी को तिरुअनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के उनके कोच ने उन्हें उस खेल (वॉलीबॉल) में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया जिसमें वह सच में खास थे। जिमी ने उनकी बात मानी और वॉलीबॉल में कमाल कर दिया।

रशियन कोच का बड़ा रोल

वॉलीबॉल के साथ जिमी ब्लाइंड चेस प्लेयर और शानदार स्विमर भी थे। उन्होंने साल 1971 और 72 में लगातार कालीकट यूनिवर्सिटी की स्विमिंग चैंपियनशिप जीती थी। बकौल अंजू, जिमी की मां अक्सर बताती थीं कि कैसे वह अपने छोटे भाइयों को कंधे पर बिठाकर तैरते थे।

साल 1976 में जिमी ने केरला पुलिस जॉइन की लेकिन उनके इस फैसले से उनकी मां खुश नहीं थी। इसी साल एक हफ्ते के लिए कैंप करने आए रशियन कोच सर्गेई इवानोविच ने जिमी का खेल देखने के बाद उन्हें प्रोफेशनल वॉलीबॉल प्लेयर बनने की सलाह दी।

इसके बाद जिमी ने साल 1979 में अबू धाबी स्पोर्ट्स क्लब जॉइन किया और प्रोफेशनल प्लेयर बने। रेडबुल से बात करते हुए उनके भाई सेबास्टियन ने बताया कि इसके तीन साल बाद साल 1982 में जिमी को एक इटैलियन क्लब के लिए खेलने का मौका मिला। साल 1982 में जिमी इटैलियन क्लब ट्रेविसो पल्लावोलो से जुड़े और इसके बाद उन्होंने गबेका पल्लावोलो नाम का क्लब जॉइन किया जिसने उनकी मौत के बाद अपने होम अरेना का नाम उनके नाम पर रखा।

बॉल को स्मैश करते जिमी

जॉर्ज ब्रदर्स वर्सेज सेलेक्टेड सिक्स

जिमी अपने घर में इकलौते वॉलीबॉल प्लेयर नहीं थे। उनसे पहले उनके पिता और फिर उनके सारे भाई, जोस, मैथ्यू, सेबास्टियन, फ्रांसिस, स्टैनली, विंस्टन और रॉबर्ट बॉबी सबने अपने जीवन में कभी ना कभी वॉलीबॉल खेली थी।

साल 1985 में केरल स्टेट टीम की कप्तानी करने वाले जिमी के छोटे भाई सेबेस्टियन रेडबुल से कहते हैं, ‘हम सारे भाई शुरुआत में बॉल उठाते थे। फिर हमें बैककोर्ट में खेलने का मौका मिला। अंततः हमें सेंटर कोर्ट पर भी उतरने का मौका मिला।

हमारे पिता का सपना था कि वह हम सारे भाइयों को कभी एकसाथ खेलते हुए देखें। उनका यह सपना अंतत: साल 1987 में पूरा हुआ। हम भाइयों ने एकसाथ मैच खेला। यह ऐतिहासिक मैच पेरावूर में खेला गया। इस मैच को जॉर्ज ब्रदर्स वर्सेज सेलेक्टेड सिक्स नाम दिया गया था। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से यह जिमी का अपने भाइयों के साथ पहला और आखिरी मैच साबित हुआ।’

सरकारी ‘उदासीनता’ के शिकार जिमी

जिमी के जाने के बाद उनके परिवार ने उनकी यादों को जिंदा रखने की पूरी कोशिश की। परिवार ने साल 1987 में जिमी जॉर्ज फाउंडेशन की स्थापना की। इस बारे में रेडबुल से बात करते हुए सेबास्टियन कहते हैं, ‘जिमी की लगभग सारी जर्सियां, अवॉर्ड्स, मेडल्स, सर्टिफिकेट्स, डायरियां और दोस्तों तथा फैंस द्वारा उन्हें लिखी गई सारी चिट्ठियां पेरावूर में रखी हैं। मैं उनके सबसे ज्यादा करीब था। मैं हमेशा उनसे प्रेरित होता था। वह मेरे रोल मॉडल थे।’

अपने माता-पिता के साथ जॉर्ज ब्रदर्स

जिमी जॉर्ज फाउंडेशन की तरफ से साल 1989 से हर साल केरल के बेस्ट स्पोर्ट्सपर्सन को जिमी जॉर्ज अवॉर्ड दिया जाता है। इसके अलावा यह फाउंडेशन जिमी के पूर्व स्कूल सेंट जोसेफ हाई स्कूल और कॉलेज देवागिरि कॉलेज में कैश अवॉर्ड्स भी देता है।

केरल सरकार ने त्रिवेंद्रम स्थित एक इंडोर स्टेडियम का नाम जिमी के नाम पर रखा है। सेंट थॉमस कॉलेज, पाला में एक वॉलीबॉल स्टेडियम का नाम उनके नाम पर है। इसके साथ ही सेंट जोसेफ हाई स्कूल के स्टेडियम और पेरावूर में एक सड़क का नाम जिमी के नाम पर रखा है। कन्नूर के जिला मुख्यालय के पुलिस डिपार्टमेंट ने अपने कॉन्फ्रेंस हॉल का नाम जिमी जॉर्ज के नाम पर रखा है।

इसके अलावा ब्रेस्किया में उनके नाम पर पालाज़ेट्टो जिमी जॉर्ज स्टेडियम है, यहां पर उनके नाम पर एक जूनियर टूर्नामेंट का आयोजन भी होता है। साल 1989 से नॉर्थ अमेरिका स्थित केरला वॉलीबॉल लीग जिमी जॉर्ज सुपर ट्रॉफी वॉलीबॉल टूर्नामेंट का आयोजन कराता है।

इतने लेजेंडरी फिगर को याद रखने में सरकारों ने जरा भी एफर्ट नहीं लगाया। बस एक इंडोर स्टेडियम का नामकरण जिमी के नाम पर करके केरल सरकार ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। जिमी इससे कहीं ज्यादा डिजर्व करते थे। अगर जिमी ने एक क्रिकेट प्लेयर के तौर पर ऐसी उपलब्धियां अपने नाम की होतीं तो शायद सीन दूसरा होता…

सभी तस्वीरें रेडबुल से साभार

Author: Suraj

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