INDvNZ : न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत के सरेंडर से निकले पांच निष्कर्ष

दो दिन में खत्म हुए ICC वनडे क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 के पहले सेमी-फाइनल मुकाबले में न्यूजीलैंड ने दुनिया के 1-2 बैट्समेन और नंबर-1 बॉलर, विश्व के सर्वश्रेष्ठ विकेटकीपर, महान टैलेंटेड ओपनर जैसे दिग्गजों से भरी हुई भारतीय टीम को पीटकर लगातार दूसरी बार फाइनल में एंट्री कर ली।

टॉस जीतकर पहले बैटिंग करते हुए न्यूजीलैंड ने निर्धारित 50 ओवर्स में 8 विकेट खोकर 239 रन बनाए। कीवी टीम के लिए कैप्टन केन विलियमसन (67) और सीनियर प्लेयर रॉस टेलर (74) ने हाफ सेंचुरी जड़ी। भारत के लिए भुवनेश्वर कुमार ने सबसे ज्यादा 3 विकेट लिए।

जवाब में खेलने उतरी टीम इंडिया ने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया। विश्व के दूसरे नंबर के बैट्समेन और इस वर्ल्ड कप की लीडिंग रनस्कोरर रोहित शर्मा दूसरे, दुनिया के नंबर वन बल्लेबाज विराट कोहली तीसरे और भयानक टैलेंट के धनी केएल राहुल चौथे ओवर में ही पवेलियन लौट चुके थे।

ऐसे में जब मिडल ऑर्डर पर मैच बचाने की जिम्मेदारी आई तो हमारी महान टीम के मिडल ऑर्डर की कलई खुल गई। टीम इंडिया निर्धारित 50 ओवर्स भी नहीं खेल पाई और 221 रन पर ही सिमट गई।

आइए आपको बताते हैं इस हार के पांच कारण

1- मिडल ऑर्डर की नाकामी

इस पूरे टूर्नामेंट में हमने अपने टॉप ऑर्डर के दम पर मैच जीते हैं। जब भी हमारे टॉप-3 ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की हमें जीत मिली और जहां ये फेल हुए वहीं मैच जिताने का पूरा जिम्मा धोनी की अगुवाई वाले टेलेंडर्स पर आ जाता है।

मिडल ऑर्डर में हमारे पास केदार जाधव जैसे सीनियर हैं जिनके हाथ में बल्ला देखने वालों को कभी भरोसा ही नहीं हो सकता कि इनसे हो पाएगा। जिन भी मैचों में जाधव खेले हैं वहां इन्होंने सिर्फ सामने वाले बॉलर्स का कॉन्फिडेंस बूस्ट करने का काम किया है। पांच पारियों में जाधव ने कुल 80 रन बनाए।

विजय शंकर मौकों का फायदा नहीं उठा पाए, हार्दिक पंड्या अकेले क्या करते और ऋषभ पंत जैसे युवा को अभी और मौके देने ही होंगे। दिनेश कार्तिक को इस वर्ल्ड कप में दो अच्छे मौके मिले लेकिन वह इन दोनों में नाकाम रहे। इस मैच में भी कहानी वही रही और ऋषभ (32), कार्तिक (6) और हार्दिक (32) में से कोई भी एक छोर नहीं थाम पाया।

2- विराट कोहली और नॉकआउट्स

विराट कोहली वैसे तो दुनिया के बेस्ट बैट्समेन माने जाते हैं। कई लोग तो उन्हें सचिन तेंदुलकर से भी बेहतर बताते हैं। कोहली चेज करने में असाधारण रिकॉर्ड रखते हैं लेकिन जब बात बड़े स्टेज की आती है तो वह बुरी तरह फेल दिखते हैं। कोहली लगातार तीन वर्ल्ड कप सेमी-फाइनल खेल चुके हैं और इन तीनों में उन्होंने कुल 11 रन बनाए हैं।

सबसे पहले उन्होंने 2011 का सेमी-फाइनल खेला जहां पाकिस्तान के खिलाफ वहाब रियाज़ ने उन्हें सिर्फ 9 रन के पर्सनल स्कोर पर आउट किया। रियाज़ ने उन्हें बैकवर्ड पॉइंट पर उमर अकमल के हाथों कैच कराया था। रियाज़ की बाहर निकल रही बॉल को कोहली समझ ही नहीं पाए और कैच थमा बैठे।

इसके बाद 2015 के सेमी-फाइनल में भारत के सामने थी ऑस्ट्रेलिया। शिखर धवन के आउट होने के बाद क्रीज़ पर आए विराट कोहली मिचेल जॉनसन की बॉल को पुल करने के चक्कर में उसे काफी ऊपर उछाल बैठे। विराट के बल्ले का टॉप एज लेकर उछली बॉल को लपक ब्रैड हैडिन ने सिर्फ 1 रन के निजी स्कोर पर उन्हें वापस भेज दिया।

कल के मैच में भी यही हुआ और एक बार फिर एक लेफ्ट हैंड पेसर ने कोहली को आसान शिकार बनाया। ट्रेंट बोल्ड की लेग स्टंप पर पड़कर मिडल की तरफ आई बॉल को कोहली खेलने से चूके और LBW हो गए।

3- सॉलिड ओपनर की जरूरत

शिखर धवन को चोट लगने के बाद केएल राहुल को ओपनर के रूप में प्रमोट किया जहां उन्होंने कुछ अच्छी पारियां भी खेली। राहुल ने इस वर्ल्ड कप की नौ पारियों में कुल 361 रन बनाए। जिसमें उनका हाईएस्ट स्कोर 111 रन रहा जो उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ आखिरी ग्रुप स्टेज मैच में बनाया।

बाकी की पारियों में राहुल ने 26 (चौथे नंबर पर बैटिंग करते हुए), 11 (छठे नंबर पर बैटिंग करते हुए), यहां से राहुल ने ओपनिंग करनी शुरू की और 57, 30, 48, 0, 77, 1 रन बनाए। ये स्कोर देखने में अच्छे लगते हैं लेकिन राहुल का गेम देखें तो ये शिखर जैसे इम्प्रेसिव नहीं दिखे। राहुल ने शुरुआत में काफी धीमी बैटिंग की जिससे अक्सर रोहित शर्मा और उनके बाद आने वाले प्लेयर्स पर प्रेशर बढ़ा।

अगर टीम मैनेजमेंट ने शिखर की चोट के बाद मिडल ऑर्डर के बल्लेबाज ऋषभ पंत की जगह कोई ओपनर भेजा होता और राहुल मिडल ऑर्डर में ही खेलते तो शायद हालात ऐसे ना होते। राहुल का प्लेइंग स्टाइल ओपनिंग की जगह मिडल ऑर्डर में ज्यादा सूट करता और इससे शायद हमारे मिडल ऑर्डर में स्थायित्व भी आता।

4- महेंद्र सिंह धोनी

इस पूरे टूर्नामेंट में महेंद्र सिंह धोनी को सबसे ज्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा। दुनिया के सबसे काबिल और सबसे सफल विकेटकीपर्स में से एक धोनी के साथ ऐसा होना शायद सही नहीं है। लेकिन अगर हम इस वर्ल्ड कप में उनकी बैटिंग देखें तो काफी हद तक यह आलोचना सही लगती है।

टूर्नामेंट के पहले मैच में धोनी ने 46 बॉल्स में 2 चौकों की मदद से 34 रन बनाए। दूसरे मैच में उन्होंने 14 बॉल्स में 27 रन बनाए और लोगों को लगा कि हमारा फिनिशर लौट आया है। तीसरा मैच बारिश के चलते रद्द हुआ और चौथे मैच में वह 2 बॉल्स में बस 1 रन बना पाए। अफगानिस्तान के खिलाफ धोनी ने 52 बॉल्स में सिर्फ 28 रन बनाए और भारत बमुश्किल ही यह मैच बचा पाया।

वेस्टइंडीज के खिलाफ 61 में 56 जिसमें से 16 रन मैच की आखिरी 6 बॉल्स में आए। इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने जरूर अच्छी बैटिंग की और 31 बॉल्स पर 42 रन मारे। बांग्लादेश के खिलाफ भी उन्होंने ठीकठाक बैटिंग की और 33 बॉल में 35 रन बनाए।

श्रीलंका के खिलाफ उनकी बैटिंग नहीं आई और फिर सेमी-फाइनल में उन्होंने 72 (पूरे 12 ओवर्स) बॉल्स में 50 रन बनाए। इस पूरी पारी में धोनी ने सिर्फ 1 चौका और 1 छक्का लगाया। यह छक्का 49वें ओवर की पहली बॉल पर लगा।

इस मैच में अगर धोनी ने इन 12 ओवर्स में 2-3 बाउंड्री और मारी होती तो शायद मैच बदल गया होता। लेकिन बाउंड्री तो दूर दूसरे एंड से जडेजा की जबरदस्त बैटिंग से कम हो रहे प्रेशर को धोनी बॉल्स छोड़कर बढ़ा ही रहे थे। धोनी ना तो सही से स्ट्राइक रोटेट कर पा रहे थे ना ही बाउंड्रीज लगा पा रहे थे।

जडेजा के आउट होने में कहीं ना कहीं धोनी की इन नाकामियों का भी बड़ा रोल था और जब मैच हाथ से निकल गया तो असंभव डबल लेने के चक्कर में धोनी पारी की जगह खुद को फिनिश कर बैठे।

5-टीम मैनेजमेंट और कप्तानी

विराट कोहली बहुत अच्छे बैट्समेन हैं और रवि शास्त्री उतने ही अच्छे कमेंटेटर लेकिन वर्ल्ड कप जीतने के लिए सिर्फ बैटिंग काफी नहीं होती और कॉमेंट्री का तो ख़ैर कोई रोल ही नहीं है। इन दोनों के फैसलों ने भारत को वर्ल्ड कप से बाहर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

पहले तो धवन के बाहर होने के बाद इन्होंने मिडल ऑर्डर बैट्समेन ऋषभ पंत को इंग्लैंड बुलाया और फिर विजय शंकर के बाहर होने के बाद टॉप ऑर्डर बैट्समेन मयंक अग्रवाल (जिन्हें खेलने का मौका नहीं मिला). टीम सेलेक्शन का यह हाल था कि इस वर्ल्ड कप के चार मैचों में 14 विकेट लेने वाले मोहम्मद शमी को सेमी-फाइनल में बाहर कर दिया गया।

फिर जब टीम अंडरप्रेशर थी तब महेंद्र सिंह धोनी से पहले ऋषभ पंत और हार्दिक पंड्या जैसे युवा प्लेयर्स को भेजा। इतना ही नहीं बिल्कुल भी टच में नहीं रहे दिनेश कार्तिक भी धोनी से पहले बैटिंग करने आए। इस वर्ल्ड कप में धोनी की बैटिंग स्टाइल देखी जाए तो शुरुआती तीन विकेट गिरने के बाद उन्हें बैटिंग मिलनी चाहिए थी।

एक छोर से वह एंकर बने रहते और युवाओं को मेंटर करते रहते तो शायद मैच निकल जाता। इस वर्ल्ड कप में कोहली और शास्त्री की जोड़ी भारतीय टीम को दिशा दिखाने में पूरी तरह नाकाम रही। उन्होंने जैसा चल रहा था वैसा ही चलने दिया।

फोटो : क्रिकेट वर्ल्ड कप से साभार

Author: सूरज

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