योगराज सिंह का ‘स्केटिंग लवर’ लड़का जो हमें दो बार वर्ल्ड चैंपियन बना गया

लगभग दो दशक पहले जब हम स्कूल में पढ़ते और क्रिकेट खूब खेलते, देखते थे…तबकी बात है। 99 के वर्ल्ड कप से पहले ICC ने एक नया टूर्नामेंट शुरू किया था ICC नॉकआउट ट्रॉफी।

करगिल वॉर के बीच हुए 99 के वर्ल्ड कप में हमारी टीम ने काफी खराब प्रदर्शन किया और सुपर सिक्स में जिम्बाब्वे से भी नीचे छठे नंबर पर रही। अगले साल ICC नॉकआउट ट्रॉफी का दूसरा एडिशन कीनिया में हुआ।

अंगार ऑस्ट्रेलिया

इसके दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत पहले बैटिंग कर रहा था। गौरतलब है कि तब टीम इंडिया का हाल बहुत बुरा होता था और हमें अपनी रैंकिंग के चलते इस टूर्नामेंट में प्ले-ऑफ मैच खेलना पड़ा था। इसमें हम जिम्बाब्वे को हराकर आगे क्वॉर्टर-फाइनल में पहुंचे थे और वहां हमारे सामने थी मशहूर ऑस्ट्रेलिया… उस दौर के क्रिकेट प्रेमी जानते हैं कि इस दौर में ऑस्ट्रेलिया के सामने पड़ने का मतलब हार के अलावा कुछ और नहीं होता था।

हमारी टीम का पिछला वर्ल्ड कप बहुत बुरा गया था और इन सबको देखते हुए इस मैच से बहुत उम्मीद तो नहीं थी लेकिन देखना तो था ही। विजय दहिया, जहीर खान और युवराज सिंह जैसे प्लेयर्स ने इसी टूर्नामेंट के जरिए अपना वनडे डेब्यू किया था। जिम्बाब्वे के खिलाफ हुए मैच के बाद जहीर का बॉलिंग एक्शन हम जैसे बच्चों का पसंदीदा बन चुका था।

युवराज सिंह : सोशल मीडिया से साभार

जबकि युवराज पहले मैच में बैटिंग नहीं कर पाया था लेकिन फील्डिंग के एरिया में वह एक क्रांति जैसा लगा। हमने अपनी याददाश्त में युवी को ही पहली बार बॉल पर झपटते देखा था वर्ना इससे पहले तो हाथ के इशारे दिखते थे… ओय देखना… जैसी आवाजों के साथ।

युवराज का आगमन

तो भइया ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हम पहले बैटिंग कर रहे थे और 19वें ओवर तक 90 के कुल योग पर सचिन, गांगुली और द्रविड़ वापस जा चुके थे। क्रीज पर मौजूद विनोद कांबली का साथ देने आए 18 साल के युवराज।

हालात यह थे कि काम-धंधा छोड़कर मैच देख रहे लोग अब वापस लौटने लगे थे। लाइट थी नहीं इसलिए हम ट्रैक्टर की बैट्री से मैच देख रहे थे। दिग्गजों के निपटने के बाद ड्राइवर ने कहा कि भैया बंद करो, हम भी निकलें अब। लेकिन मेरी उम्र के कई बच्चों ने मिलकर उसे रोका और मैच जारी रहा। धीरे-धीरे मैच आगे बढ़ा और ग्लेन मैक्ग्रा, ब्रेट ली, जेसन गिलेस्पी जैसे बॉलर्स के खिलाफ युवराज बेफिक्री से शॉट जमाने लगा।

खूबसूरत ड्राइव्स, फ्लिक और पुल शॉट्स लगा रहे युवी को देखकर लग ही नहीं रहा था कि यह बंदा पहली बार वनडे इंटरनेशनल खेल रहा था। युवी ने महज 80 बॉल्स पर 12 चौके मारकर 84 रन बनाए और इंडिया को 265 तक पहुंचाया। बाद में फील्डिंग करते हुए इयान हार्वी का बेहतरीन कैच और फिर माइकल बेवन को जबरदस्त तरीके से रनआउट करने वाले युवी को इस मैच में मैन ऑफ द मैच चुना गया।

सोशल मीडिया से साभार

चीते जैसा युवी

युवी ने जिस तरह से अपनी बाईं तरफ हवा में गोता मारकर हार्वी का कैच पकड़ा वह हम लोगों के लिए बिल्कुल ही नई चीज थी। पहली बार हमने किसी इंडियन को बॉल पर चीते की तरह झपटते और सफलतापूर्वक दबोचते हुए देखा। वनडे के बेस्ट फिनिशर्स में से एक माइकल बेवन को रनआउट करने के लिए लगाई गई युवराज की डायरेक्ट हिट आप बिना बोर हुए सैकड़ों बार देख सकते हैं।

इस मैच ने इंडियन क्रिकेट को नया हीरो दे दिया। सेमी-फाइनल में साउथ अफ्रीका के खिलाफ युवी ने 35 बॉल्स पर 41 मारे और फिर फील्डिंग में भी शानदार प्रदर्शन कर कई रन बचाए। इस टूर्नामेंट से विश्वपटल पर उभरे युवराज ने इसके बाद आने वाले कई सालों तक टीम इंडिया को मैच जिताए।

खूब चला बल्ला

कई चमत्कारिक पारियां खेलीं जिनमें नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल… पहले T20 वर्ल्ड कप के सुपर-8 मुकाबले में ब्रॉड को लगाए 6 छक्के। इसी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 30 बॉल पर 70 रन।

2011 वर्ल्ड कप में इंग्लैंड के खिलाफ 58, आयरलैंड के खिलाफ 50, वेस्टइंडीज के खिलाफ 113, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वॉर्टर-फाइनल में 57 जैसी इनिंग्स के दम पर प्लेयर ऑफ द सीरीज बनना… ऐसे तमाम मोमेंट्स हैं जब युवी ने अकेले दम पर टीम इंडिया को जीत दिलाई।

2011 वर्ल्ड कप फाइनल : सोशल मीडिया से साभार

2011 वर्ल्ड कप के बाद पता चला कि युवी को कैंसर है। हमें लगा कि अब हम अपने चैंपियन को खो देंगे लेकिन जो ऑस्ट्रेलिया के प्राइम पर ऑस्ट्रेलिया से नहीं डरा उसे कैंसर क्या डरा पाता। भाई ने वापसी की और फिर से क्रिकेट पिच पर दहाड़ा…लेकिन एक वक्त आता है जब सबको रुकना पड़ता है।

जब आप पूरी ताकत लगाने के बाद भी अटक से जाते हैं, आगे नहीं बढ़ पाते। युवी के जीवन में भी वह दिन आया और लंबे वक्त से टीम इंडिया से बाहर भारत के युवराज ने नीली जर्सी दोबारा पहनने की उम्मीद छोड़ते हुए क्रिकेट को अलविदा कह दिया।

2011 वर्ल्ड कप जीतने के बाद मैन ऑफ द सीरीज लेने जाते युवी : सोशल मीडिया से साभार

कम ही लोग जानते हैं कि क्रिकेट युवराज का पसंदीदा गेम नहीं था। शुरुआत में युवी टेनिस और रोलर स्केटिंग करते थे। जब युवी रोलर स्केटिंग में अंडर-14 के नेशनल चैंपियन बनकर लौट रहे थे तो उनके पिता पूर्व क्रिकेटर योगराज सिंह ने चलती कार से उनका मेडल बाहर फेंक दिया।

योगराज ने कहा कि तुम्हें सिर्फ क्रिकेटर बनना है और कुछ नहीं। इसके बाद युवी ने क्रिकेट पर ध्यान देना शुरू किया और भारत को दो-दो बार वर्ल्ड चैंपियन बनाकर आज इस 22 गज की पट्टी को अलविदा भी कह दिया।

थैंक्यू युवी

Author: सूरज

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *